Thursday, June 22, 2017

कृषक की स्थिति

आजकल बहुत तेज़ी से खबरें आ रही हैं हर तरह की मीडिया में किसानों की आत्महत्या और उनके आंदोलन की। पहली बार नहीं है, हर साल होता ऐसा होता है, कभी कम कभी ज्यादा, कभी आंध्र में तो कभी पंजाब में। देश का कोई कोना नहीं छूटा है इन दुखभरी खबरों से। दुःख होता है लेकिन उससे भी ज्यादा दुःख इन आत्महत्याओं को रोकने के लिये होने वाले तथाकथित प्रयासों को देख कर होता है।
हम आजतक कृषि और कृषक को पृथक निगाह से नहीं देख पाये और खुद को किसानमित्र समझने में हम गर्वित भी हो गये। पिछले बीस साल में केवल दो बार कृषक, कृषि के कारण दुःखी हुआ है। एक बार जब प्याज कम हुआ था और एक बार जब दलहन कम हुयी थी। कृषक दुखी है मित्रों कृषि नहीं, इस बात को हमें और सरकारों को समझना होगा। अब क्या है कृषक के दुःख का कारण जब कृषि सम्पन्न है?
इस बात को समझने के लिये हमें थोड़ा अर्थशास्त्र का सहारा लेना पड़ेगा। अर्थशास्त्र इसलिये क्योंकि जब तक कृषक को हम व्यापारी के तौर पर देखना नहीं शुरू करेंगे तब तक हम उसे मज़दूर के रूप में ही देखना पसंद करेंगे। सारी दुनिया में व्यापार मांग और आपूर्ति के सिद्धांत पर चलता है। मांग को बढ़ाने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। कृषि क्षेत्र एक ऐसा क्षेत्र है जहां हम कभी मांग को बढ़ा नहीं सकते हैं। खाद्यानों की मांग बढ़ाई नहीं जा सकती लेकिन उसमें विविधता इतनी है जिसकी आपूर्ति कभी भी सफल नहीं हो पाती है। समय की मांग इस विविधता को कृषक के फायदे के तौर पर प्रयोग करने का है।
आज का भारतीय कृषक माँग के अनुसार नहीं बल्कि देखा देखी फ़सल का चुनाव करता है। ये नियम केवल फ़सलों में नहीं बल्कि पद्धति और दूसरी चीजों पर भी लगता है लेकिन वहां पशिक्षण के प्रयास हो रहे हैं इसलिये उनका वर्डन नहीं करूंगा। लेकिन फसलों का चुनाव एक प्रमुख कारण है कृषक के दुखी होने का उसका मैं थोड़ा विस्तृत वर्डन करना चाहूंगा।
हर वर्ष ऐसा होता है कि कोई एक उपज अकूत मात्रा में होती है और कोई अल्प और दोनों ही हालात में किसान दुखी। अकूत मात्रा वाले के पास खरीददार नहीं होते और कम फसल वाले के पास कुछ बेचने के लिये नहीं होता है। समय की माँग इस पैदावार और इसके व्यापार के संयोजन की है। सरकारें जितनी शक्ति ऋण माफी में लगा रही हैं उसका आधा भी अगर इस संयोजन में लगाने का प्रयास करें तो कृषक भिक्षुक नहीं बनेगा। पूरे देश में कोऑपरेटिव सोसाइटियों का जाल फैला हुआ है। सरकार के पास संसाधन इस ख़ाके को कार्यान्वित करने का उपलब्ध है। इसके बाद भी ऐसा क्यों नहीं है? ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि कोई खाका ही नहीं है और न इस प्रकार के किसी भी प्रयास का कोई इतिहास है। वे कोआपरेटिव सोसाइटियां केवल ऋण देने, खाद देने और इस बात को सिद्ध करने में व्यस्त रहती हैं कि ओ गरीब किसान देख तेरे से अच्छी खेती तो हमारे वैज्ञानिक कर लेते हैं। एक किसान होने के नाते सरकार को केवल इतना सुझाव देना चाहूंगा कि "हे राजन, हमें हमारे उपज का ग्राहक नहीं मिल रहा और अगर जो मिल रहा है तो मूल्य नहीं मिल रहा, बस कोई ऐसा नियम बनाये की अगर कोई भूखे पेट न रहे तो कोई अनपकी फसल भी न रहे"।